खामोशियों को अगर कोई समझ जाए तो अल्फ़ाज़ की ज़रूरत ही क्या है...
अगर दर्द को ही लोग समझ जाएं तो फिर आशुओं की जरूरत ही क्या है...
बयां कर दू अपने सारे जख्मों को, अपनी खामोशियों से ही...
मगर जब ज़ख्म ही भर जाए तो फिर, मरहम की ज़रूरत ही क्या है...
अगर दर्द को ही लोग समझ जाएं तो फिर आशुओं की जरूरत ही क्या है...
बयां कर दू अपने सारे जख्मों को, अपनी खामोशियों से ही...
मगर जब ज़ख्म ही भर जाए तो फिर, मरहम की ज़रूरत ही क्या है...
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