(साइड अपर वाली ladki....)
इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में समय की रफ़्तार इतनी तेज है कि समय कब निकल जाता है कुछ पता ही नहीं चलता...कब सुबह होता है...कब शाम...और कब रात...
समय उस रेत की तरह है जिसे हम मुट्ठी में रख तो सकते हैं लेकिन कैद नहीं कर सकते...वो कहीं ना कहीं से निकल ही जाता है...
इस शहर में एक दूसरे का हाल चाल जानने के लिए किसी के पास टाइम नहीं...
दोस्त बोलते हैं तू बदला गया...रिश्तेदार बोलते हैं...घमंडी हो गया...अब उनको कौन समझाएं कि बुलेट ट्रेन को रफ्तार बढ़ गई...लेकिन उनकी सोच की रफ़्तार अभी वहीं की वहीं है...
यहां हमे ये भी पता नहीं होता कि हमने अपना ख़ुद का हाल चाल भी कब लिया...क्या खाया, क्या पहना, कब सोया, कुछ पता नहीं...हम बस पैसों के पीछे भाग रहें हैं...और पैसा है कि हमें भगा रहा है...कभी घर से ऑफिस तो कभी ऑफिस से घर...
वो कहते हैं ना...
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी छोड़ आया हूं...
चंद पैसे कमाने के लिए घर छोड़ आया हूं...
एहसास तब हुआ जब घर से बहुत दूसर निकल आया हूं...
अपना घर छोड़कर किराए के घर में रहने आया हूं...
जमीन लिखवाने के सिलसिले से मैं घर जा रहा था...नोएडा से प्रतापगढ़...
हमारी ट्रेन का समय भी सुबह 7 बजे था...इतनी सुबह उठना असंभव...
जो इंसान ऑफिस से ही रात को 2 बजे रूम आया हो वो इतनी जल्दी ट्रेन कैसे पकड़ सकता है...फिर भी अलार्म 4 - 5 लगा रखा था जिससे जल्दी उठ जाऊं... ट्रेन छूट गया तो फिर बड़ी दिक्कत हो जाएगी...
5वीं अलार्म में आख़िर कर मेरी नींद खुल ही गई...जल्दी जल्दी तैयार होकर केव बुक करता हूं भागता हूं...
आख़िर ट्रेन मैंने पकड़ ही ली...
मेरी सीट थी side लोअर... ये अच्छा था मेरे लिए...बहुत भीड़ थी, लोगों का इतना शोर था कि बस ट्रेन चल जाए यही मना रहा था...
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी...खिड़की के बाहर भागती हुई रोशनी और अंदर हल्की-सी ठंडी हवा...सफर की शुरुआत कुछ अलग ही लग रही थी...
तभी एक छोटी सी, प्यारी सी, एक अंजान सी लड़की साधारण कपड़े, कंधे पर बैग, और चेहरे पर हल्की-सी थकान के साथ एक शांत मुस्कान... उसने इधर-उधर देखा और मेरी सामने वाली सीट पर आकर बैठ गई...पहले तो बस नज़रें मिलीं… फिर दोनों ने जैसे अनदेखा कर दिया...
फिर वो खिड़की के बाहर देखने लगी...वो अकेली थी, शायद थोड़ी डरी सी भी, थोड़ा टाइम बीतने के बाद जब वो comfert हो गई तब मैने पूछा,
आपकी सीट...
उसने बोला साइड अपर है...
मैने कहा ठीक है...
कुछ देर बाद ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली...चाय वाले की आवाज आई—“चाय, चाय” मैंने एक कप लिया...और शायद हिम्मत जुटाकर पूछा,...“आप लेंगी?” उसने हल्के से सिर हिलाया... “नहीं, धन्यवाद” फिर कुछ सेकंड की चुप्पी…
टीटी साहब आते हैं हम लोगों का टिकट चेक करते हैं...
और फिर उसने खुद पूछा... आप कहाँ तक जा रहे हैं...मैने बताया प्रतापगढ़...
बस यहीं से बात शुरू हुई...पता चला वो भी उसी शहर जा रही थी जहाँ मुझे उतरना था...प्रतापगढ़
मैं प्रतापगढ़ का हूं और वो भी प्रतापगढ़ की ये सुनने के बाद हम दोनों को थोड़ा अच्छा लगा कि चलो बढ़िया है...आखिर अपने शहर का कोई तो मिला...
मैने पूछा प्रतापगढ़ में कहां, उसने बताया भगवा चुंगी...
जो कि मैं वहां से हमेशा आता जाता हूं...
काफी कुछ हमने बात की प्रतापगढ़ के बारे में...वो तो बहुत कुछ जानती थी... मैंने भी अपना परिचय बताए...
मीडिया लाइन से हूं...
और वो लड़की btech कर रही थी...
उसने अपने बारे में सबकुछ बताया...अच्छा लगा सुनकर बात कर...कुछ अपनापन का एहसास हुआ...
उसने अपना मास्क उतारा...अच्छी थी देखने में..सुंदर भी...खूबसूरत भी...
हम दोनों बात करते करते कब शाम हो गया कुछ पता ही नहीं चला...लेकिन हमारी बातें खत्म नहीं हो रही थीं...कभी कॉलेज की बातें, कभी नोएडा शहर की, कभी उन छोटी-छोटी चीज़ों की जो हम अक्सर किसी अजनबी से ही कह नहीं पाते हैं...
कभी-कभी वो ऊपर से झुककर कुछ कहती, और मैं नीचे से जवाब देता...उस छोटे-से स्पेस में एक अजीब-सी दोस्ती बन हो गई थी...बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी वादे के...
वो कहतें हैं ना...
क्यों कभी कोई दिल के पास आ जाता है...
कैसे कभी किसी अजनबी से रिश्ता बन जाता है...
रिश्ता भी इतना गहरा कि वो दिल में बस जाता है...
और वो अजनबी अजनबी से अपना बन जाता है...,
जैसे कि तुम...
आख़िर हम प्रतापगढ़ पहुंचने वाले थे...
मैने पूछा कैसे जाओगी घर, उसने बोला पापा आयेंगे लेकिन देर हो जाएगी...घर पर कोई नहीं है मम्मी है लेकिन वो आ नहीं सकती...
फिर मैंने बोला...
मेरे भैया आए हैं कार से मुझे रिसीव करने, मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूं अगर कोई प्रॉब्लम ना हो तो...
लेकिन उसने मना कर दिया...
सही है अभी हम इतने अच्छे दोस्त भी नहीं थे कि एक दूसरे पर विश्वास कर सके...
मैंने ना उसका नाम पूछा और ना ही नंबर...दिल में कश्मकश था कि अब दोबारा कभी मुलाक़ात होगी भी की नहीं...क्या पता हम दोनों का सफ़र यहीं तक का हो...
ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो रही थी....और हमारी दिल की धड़कन तेज़...
पता नहीं क्यों अजीब सा लगाव हो गया था, उसकी बातें...उसका व्यवहार...और वो लड़की...
ट्रेन रुकती है...
उसने अपना बैग उठाया और मुस्कुराकर कहा...अच्छा लगा आपसे मिलकर...मैंने भी मुस्कुराकर जवाब दिया...मुझे भी...
कोई नंबर नहीं लिया, कोई वादा नहीं किया...बस एक याद अपने साथ ले लिया...हम दोनों साथ उतरते हैं...
बड़ी हिम्मत कर के मैंने उसे अपना नंबर दिया...
भविष्य में कभी कुछ आपको लगे किसी भी प्रकार की हेल्प की तो आप हमसे contect कर सकती हैं...
फिर मैं वहां से निकल गया...और भीड़ में वो कहीं खो गई...और मैं अपने रास्ते चल पड़ा...
सफ़र यादगार था, वो लड़की भी ...
कभी-कभी अंजान लोग हमारी जिंदगी में बस कुछ घंटों के लिए आते हैं… लेकिन वो कुछ घंटे, पूरी उम्र की याद बन जाते हैं।
कुछ महीनों बाद....
मैने उस लड़की का नाम तो पूछा नहीं था, और उसका नंबर भी मेरे पास नहीं था...लेकिन मेहरबान हो उस ट्रेन में टीटी साहब का...टिकट चेक करते समय उसने उस लड़की से उसका नाम पूछा था, और उसने अपना नाम बताया था...
मैंने भूतकाल में जाकर फिर से उस सिचुएशन में उस टीटी की बातों को याद किया तो उस लड़की ने जो नाम बताया था...फिर मुझे याद आया...
Vanya
अजनबी शहर और अजनबी दोस्त कब अपने बन जाते हैं मालूम ही नहीं पड़ता... और जो अपने होतें है कब अजनबी बन जाए ये भी मालूम नहीं पड़ता... ये जो रिश्तों की डोर होती है ना, इसे कितना मजबूत करना है ये हमारे ऊपर निर्भर करता है....
और कहते हैं ना कि कुछ रिश्ते ऊपर वाले बनाते हैं....
शायद ये सही है...
पर मुझे लगता है कभी-कभी कुछ रिश्ते फेसबुक भी बनाते हैं...
हां ये बिल्कुल सही है...
बैठा था उदास ज़िन्दगी के सफ़र में...
सोचा था कि कोई कारवां मिल जाए...
मेरे सपनों को जो कर दे हक़ीक़त...
ऐसा कोई नज़ारा मिल जाए...
जो मिटा दे मेरी खामोशियों को मुझसे ही एक पल लिए...
रब करे मुझे उस तिनके का सहारा मिल जाए...
फिर क्या... अचानक से मुझे फेसबुक पर वही लड़की दिखी खूबसूरत सी, प्यारी सी, मासूम सी,
उसका नाम vanya gupta
अरे ये तो वही लड़की ट्रेन वाली...मुझे तो यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि उससे कभी मुलाक़ात हो पाएगी...
अब तो लग रहा था कि ये दिल का कनेक्शन है...नहीं तो ऐसे ही कोई नहीं मिलता
कहते हैं ना जब किसी को दिल से याद करो तो पूरी कायनात लग जाती है उसे मिलाने में...
मैंने friend request भेज दी।
मज़े की बात ये कि उसने तुरंत एक्सेप्ट भी कर लिया...
मैने पूछा पहचाना,
उसने बोला अरे हां मुझे यक़ीन नहीं हो रहा है कि आपसे कभी दोबारा मुलाकात होगी...
वो भी खुश हो गई और मैं भी...
हम दोनों नंबर शेयर करते हैं और खूब बात करते हैं...
अब हमारी दोस्ती काफी अच्छी हो गई थी...
मैंने अपनी लाइफ की जितनी भी शॉर्ट फिल्म थी, उसे सब बता रखी है... बचपन से लेकर अभी तक की सारे बातें, वो सारे लम्हें जो मेरे यादों में मेरी बातों में अक्सर दखलंदाजी कर ही जाती हैं....
और उसने भी अपनी सारी कहानी कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी...
ऑफिस में काम करते-करते जब दिमाग की नशें फट जाती हैं...और हेडफोन लगाए-लगाए सर में इतना दर्द भर जाता है...तब उस दर्द को खत्म करने के लिए...कुछ देर के लिए मैं इस लड़की से बात कर लेता हूं...सर का दर्द हो या बदन का दर्द... सब गायब हो जाता है...
ऑफिस में बहुत सी लड़कियां है ख़ूसबूरत हैं...मॉडर्न भी हैं...हॉट भी हैं...सेक्सी भी हैं...मगर उनमें वो खूबसूरती नहीं जो इस लड़की में हैं...
ख़ूसबूरत का मतलब चेहरे से पर्सनेलिटी से नहीं...वो तो बस दिल को अच्छा लगना चाहिए...जिसके साथ आप कंफर्ट हो...जिसे देखकर अच्छे अच्छे ख़्याल आए...उनका बुरा तो कभी आप सोच भी ना पाए...जिसे देखकर दिल को सुकून मिले...ये होती है खूबसूरती...जैसे कि तुम...
तुमसे बात करना मेरी आदत नहीं… मेरी फेवरेट चीज़ बन गई है... या...तुम्हारी दोस्ती मिली है...पर दिल कहता है—कहानी यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए।
तुमसे बात करना अच्छा लगता है… और ये ‘अच्छा लगना’ शायद थोड़ा ज़्यादा हो गया है।
हां ये है कि दुनिया के इस भीड़ में कोई है जो मुझे बहुत पसंद है...
सब की परवाह नहीं करता...लेकिन हां तुम्हारी फ़िक्र है...
आज यहां है... कल कहीं और होंगे...
फिर भी हमारी तरफ़ से दोस्ती...मजबूत है....
वो कहते हैं ना...
सुकून मिलता मुझे... तुम्हें खैरियत से देखने पर...
क्या फर्क पड़ता है कि...तुम हमारे हो या किसी और के...