आज रास्तों से नहीं...खुद से मिलने निकलूँगा...
भीड़ में नहीं....अपने भीतर की ख़ामोशी में टहलूँगा...
एक कप चाय... खुला आसमान...और दिल में उमड़ते कुछ अनकहे अल्फ़ाज़...
शायद कोई नई गली...कोई पुराना पेड़...या हवा का कोई झोंका...एक नई कविता बन जाए...
आज न ऑफिस की घड़ी का शोर है...न ज़िम्मेदारियों की दस्तक...
आज बस मैं हूँ...मेरी साँसें हैं...और उन ख़्वाबों की आवाज़ जिन्हें मैं हर रोज़ टाल देता हूँ...
आज शहर की गलियों में नहीं, मैं ख़ुद की तलाश में निकलूँगा...
आज वक़्त को नहीं...वक़्त मुझे देखेगा...
कि एक आदमी...जो रोज़ ज़िंदगी कमाने निकलता है...
आज ज़िंदगी जीने निकला है...
हाथ में चाय होगी, जेब में कुछ अधूरे ख़याल...
और दिल में एक पूरी कविता...
जिसे शायद आज कोई काग़ज़ मिल जाए...
रोज़ सुबह मैं वक़्त के पीछे भागता हूँ...
आज वक़्त मेरे साथ चल रहा है...
न कोई मीटिंग...न कोई फ़ाइल...
न किसी की आवाज़...बस एक खुला आसमान...
कुछ अनजाने रास्ते...और मेरा बेफ़िक्र मन...
सोचा है...
किसी पार्क की बेंच पर बैठूँगा...चाय की चुस्कियों में कुछ अल्फ़ाज़ घोलूँगा....
हवा से दो-चार बातें करूँगा...और जो दिल बरसों से चुप है...
उसे काग़ज़ पर उतरने दूँगा...
क्योंकि मैं सिर्फ़ एक कर्मचारी नहीं...मैं एक मुसाफ़िर भी हूँ...
और उससे पहले...एक कवि हूँ... (आशीष)