ज़रूरी नहीं कि हर बात का इजहार अल्फ़ाज़ से ही किया जाए...
कभी-कभी खामोशियां भी बयां कर जाती है अपने जज़्बात को...
आशीष गुप्ता...
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...