तुम अदालत हो तो हम भी गुनहगार हैं...
तुम जज हो तो हम ही सज़ा के हकदार हैं...
आशीष गुप्ता...
तुम अदालत हो तो हम भी गुनहगार हैं...
तुम जज हो तो हम ही सज़ा के हकदार हैं...
आशीष गुप्ता...
चलो आज मै कहता हूं.... हां मैंने मोहब्बत किया है तुमसे...
एक बार नहीं... कई बार मोहब्बत किया है तुमसे...
कभी तुम पूछते तो मैं बताता...कितनी मोहब्बत है तुमसे....
जान क़दमों पे रख देता तुम्हारे और कहता... इतनी मोहब्बत है तुमसे....
आशीष...
मीठा अगर ज़हर भी हो तो पीने में मज़ा आता है...
इश्क़ अगर सच्चा हो तो इश्क़ करने में मज़ा आता है...
आशीष....
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...