नई-नई सुबह गर हो तो, दिन भी अच्छा लगता है...
नया-नया शहर गर हो तो, शहर भी अच्छा लगता है...
ढूंढ लो कितना भी सुख, इस सारे संसार में...
लेकिन थोड़ी सी तकलीफ गर हो तो, अपना घर ही अच्छा लगता है...
आशीष गुप्ता...
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...
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