आज कल हवाओं का रुख भी कुछ बेवफ़ा सा है...
आदमी की तन्हाई देखकर...मौसम अपना मिजाज़ बदलता है...
आशीष गुप्ता
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तुम करोगे इश्क़... तब समझोगे... मोहब्बत क्या चीज़ होती है... हमने किया तो एहसास हुआ... ख़ुद बर्बाद करने की सज़ा क्या होती है.... आशीष
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इतने दिनों से जिसकी रह तकि... वो सर झुकां के बगल से यूं गुजर गए... मैंने झट से ही जैसे उनका नाम लिया... पलटकर मुस्कुराया और बिना कुछ कहे ...
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सोचते सोचते आज सुबह से शाम हो गई... ख़्वाबों में तुमसे आज थोड़ी सी मुलाक़ात हो गई मेरे जिश्म में तेरे जिश्म कि ख़ुशबू घुली कुछ इस कदर... हम ...
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तुम अदालत हो तो हम भी गुनहगार हैं... तुम जज हो तो हम ही सज़ा के हकदार हैं... आशीष गुप्ता...
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