इतने दिनों से जिसकी रह तकि...
वो सर झुकां के बगल से यूं गुजर गए...
मैंने झट से ही जैसे ही उनका नाम लिया...
पलटकर मुस्कुराया और चले गए...
आशीष गुप्ता....
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...
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