छत पर ख़ूबसूरत सी लड़की... और हाथों में पतंग...
चले जिधर हवा... पतंग उड़े उसी के संग...
खुला खुला मौसम है... खुले खुले बाल है...
लड़की तू तो सीधी है... लेकिन लगती बड़ी कमाल है...
काश मै तेरा पतंग ही होता...
दूर आकाश से ही सही... तुझे निहारता ही होता...
तुम छोड़ती फिर पकड़ती,और अपने हाथों में फिर जकड़ती...
या मै उस पतंग का धागा ही होता...
तेरी कोमल सी हाथों को चूमता ही होता...
खुले बालों में कयामत सी लगती हो तुम..
क्या कहूं मै कितनी प्यारी सी लगती हो तुम...
आशीष गुप्ता...
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