मुसीबतें कितनी ही बड़ी क्यों ना हो... एक विश्वास ही काफी है ज़िन्दगी में उम्मीद जगाने के लिए...
अंधेरा कितना ही ज्यादा क्यों ना हो... एक दीपक ही काफी है अंधकार मिटाने के लिए...
आशीष......
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...
No comments:
Post a Comment