आज चांद तरे भी कुछ कुछ...बातें कर रहें हैं...
दूर आसमान से रोज़ तेरा...दीदार कर रहें हैं...
तू कब आएगी छत पर वो आज...टकटकी लगाएं बैठें हैं...
तेरी एक झलक पाने के लिए कब से तेरा...इंतजार कर रहें हैं...
आशीष गुप्ता....
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...
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