मैं तो ज़िंदगी को ज़िन्दगी की तरह जिए जा रहा था...
अंजान सफ़र में सफ़र किए जा रहा था...
मुझे क्या पता था कि... मैं भी किसी का शिकार हो जाऊंगा...
किसी के मोहब्बत में ख़ुद ही बर्बाद हो जाऊंगा...
बताऊंगा दास्तां तो हर एक दुश्मनों का नाम आएगा...
उन दुश्मनों से पहले मेरे दोस्तों का नाम आएगा...
जिनसे भी मैंने मोहब्बत किया था बेइंतहा किया था...
जान क़दमों में रख दिया था लेकिन उफ्फ तक ना किया था...
ख़ैर वो एक दौर था जो आज मैं भूल गया हूं...
तेरा साथ पाकर मैं ख़ुद को भूल गया हूं...
अब ज़िन्दगी के सफ़र में तुम ही मेरे हमसफ़र हो...
मोहब्बत भी तुम हो... इश्क़ भी तुम हो...मेरे रहगुजर भी तुम हो...
मैं कहीं दूर की बातें नहीं करता...
मैं कोई भी झूटे वादे नहीं करता...
मेरी मोहब्बत में इतनी सच्चाई है कि...
मैं यूं ही हावाओं में बातें नहीं करता....
मैं तो बस इतना कहूंगा...
मोहब्बत तुमसे बेशुमार है... बस इतना कहूंगा...
यक़ीन ना हो तो मेरे दिल की धड़कनों से पूछ लेना...
फिर भी यकीं ना हो तो उन चांद तारों से पूछ लेना...
जो रात भर तुम्हारे दीदार में पलकें बिछाएं बैठें हैं...
तुम आओगी छत पर ये उम्मीद लगाएं बैठें हैं...
तेरे इश्क़ ने हर किसी को दीवाना कर रखा है...
ख़ूबसूरती ने तुम्हारे हर किसी को पागल कर रखा है...
तुम्हारे आने से आज पत्थर से मोम हो गया हूं...
मैं अधूरा था तुम बिन देखो आज पूरा हो गया हूं...
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