कुछ पता नही बस यूं हीं...दरबदर भटकता रहता हूं...
जिस दिन से देखा था उसे... बस उसे ही खोजता रहता हूं...
क्या करूं कमबख्त... ये इश्क़ का आलम ही कुछ ऐसा है...
आज कल उसी के ख्यालों में ही... खोया रहता हूं...
आशीष......
आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...
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