Monday, 29 January 2018

लव ऑफ़ चाइल्ड....




तुम्हें मालूम है ना, एक बार जब तुम्हारी याद आयी थी...
कागज़ के छोटे से टुकड़े से, मैंने तुम्हारे लिए एक नाँव बनाई थी...
वो नाँव जब पानी से होकर तुम्हारे घर को जाती थी...
तब तुम उस छोटे से कश्ती को देखकर, कितना ख़ुश हो जाती थी...
और ये ख़ुशी देखने के लिए मेरी आँखे भी कितनी तरस जाती थी...
वो बचपन का प्यार था, जो तुमसे हुआ था...
वो मासूम सा प्यार था, जो मुझको हुआ था...
तुम्हें मालूम है ना, जब गली के लड़के तुम्हें परेशान करते थे....
फिर हम दोनों मिलकर, उनकी खूब पिटायी भी करते थे...
तुम्हें मालूम है ना कि, मै तुम्हें मनाउ इसलिए तुम रूठ जाया करती थी...
फिर अगर ना मनाउ तो, आँखो में मोटे-मोटे आँशु भी लाया करती थी...
तुम्हें मालूम है ना कि, मैंने तुम्हारे लिए एक छोटा सा मिट्टी का घर बनाया था...
और उस घर में सपनों का ताज़महल भी बनाया था...
तुम्हारा कमरा अलग था उसमे, मेरा भी कमरा अलग था उसमें...
तुमने उसमे बीच की दिवारों को तोड़ दिया...
उन नन्ही हाथों से एक प्यारा सा रिश्ता जोड़ दिया...
वो सपनों का घर आज मैंने साकार कर दिया...
उन दोनों कमरों को आज मैंने एक कर दिया...
मगर आज भी वो घर कितना खाली-खाली लगता है...
रहते हैं बहुत से लोग, मगर तुम्हारी जगह आज भी कितना खाली-खाली सा लगता है...
तुम आओगी एक दिन यही सोचकर बैठें हैं...
उस कमरे के बिस्तर को आज भी समेट कर बैठें हैं...
इंतजार आज भी है, कल भी था, और हमेशा रहेगा...
तुम आओगी एक दिन, ये एहसास हमेशा रहेगा...

आशीष गुप्ता...

3 comments:

ये ज़माना बदल गया, अपना शहर बदल गया... जिसको जिसको अपना समझा, वो हर इंसान बदल गया... मैं जनता हूं तुम नहीं बदले, ये बदलाव तो दुनिया का दस्तू...