Tuesday, 20 December 2022

घर से दूर....




जिंदगी में कौन खुश नही रहना चाहता...परिवार को छोड़कर बाहर कौन जॉब करना चाहता है...मगर कुछ मजबूरियां है कुछ ख्वाहिशें हैं...जिसके कारण लोग...अपनों से दूर कहीं अंजान शहर में रहने को मजबूर हो जाते हैं...जहां कोई जानने वाला नही...कोई पहचानने वाला नही...होते हैं तो बस किराए के कमरों के वो चार दीवार...और वो चार दीवार परिवार की कमी को कभी पूरा नही कर सकती...
कुछ लोग कहते हैं कि बाहर रहना ऐश की जिंदगी होती है...कोई रोकने वाला नही...कोई टोकने वाला नही... कुछ भी करो...कुछ भी खाओ... कहीं भी घूमों...मगर असल जिंदगी में ऐसा होता कहां है...
कुछ दिन की जगमगाती जिन्दगी कब अंधकार सी लगने लगती है कुछ मालूम नहीं पड़ता...
कहतें हैं ना...
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी छोड़ आया हूं...
चंद पैसे कमाने के लिए घर छोड़ आया हूं...
एहसास तब हुआ जब घर से बहुत दूर निकल आया हूं... 
अपना घर छोड़कर किराए के घर में रहने आया हूं...

दोस्त, यार, प्यार, मोहब्बत, पैसा, कोई कितना भी साथ हो मगर परिवार से दूर रहना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है....


आशीष गुप्ता...

Friday, 1 July 2022

मोहब्बत

मोहब्बत है इतना की कैसे बताए तुम्हें हम....
खुद को भूल जाता हूं....जब याद आतें तुम....



Saturday, 23 April 2022

तेरी मोहब्बत में हम शरीफ से बदमाश हो गए...
बेकसूर तो हम भी थे गुनहगार हो गए...


Thursday, 31 March 2022

तेरा नाम लिख रहा हूं....

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं लेकिन आज लिख रहा हूं...
मोहब्बत की पहली बरसात लिख रहा हूं...
बागों में जो महके वो खुश्बू लिख रहा हूं...
और उस खुश्बू से महकता हुआ शाम लिख रहा हूं...

Wednesday, 26 January 2022

सफ़ेद चादर...

आओ चलते हैं...कहीं दूर...बहुत दूर...
जहां कोई भी ना हो...
तुम हो हम हो...और ये ऊंची ऊंची पहाड़ की चोटियां...
जो बर्फ की चादर को लपेटकर...अपनी खूबसूरती का इजहार कर रही है...
दिल करता है... ख़ुद को भूल जाऊं...
और समा जाऊं...इन ख़ूबसूरत पहाड़ों के बीच में...

इन ठंडी हवाओं को सुनो ना...
जो पहाड़ों से टकराकर...
बर्फ की चोटियों से गुजरकर...
हमसे कुछ कह रही है....
हमें एहसास करा रही है अपने होने का...
इन ख़ूबसूरत वादियों से तो किसी को भी प्यार हो जाए...
लेकिन आसान कहां है तुमसे मोहब्बत करना...

आशीष गुप्ता...

Tuesday, 7 September 2021

अधूरी मोहब्बत....


तुम्हें देखता हूं तो मेरी आंखें भी झुक जाती है...
क्या ये मोहब्बत नहीं है...
ना देखूं तो मेरा दिल भी तड़प सा जाता है...
क्या ये मोहब्बत नहीं है...
जरूरी है क्या... की हर मोहब्बत का इजहार करूं...
कभी तुम भी मेरी खामोशियों को समझो...
जो खामोश होकर भी बहुत कुछ बयां कर जाती है...
सुना है तुम किताब पढ़ती हो...
कभी मेरा चेहरा भी पढ़कर देखो ना...
आंखों में झांक कर देखो... तो पता चलेगा...
की कितनी मोहब्बत है तुमसे...
तुम्हारे मोहब्बत के दरिया में... इस कदर डूबा हुआ हूं मैं कि...
ना तो इसका कोई किनारा ही मिल रहा है...
और ना ही कोई मंजिल...
हर तरफ़ बस तेरी यादों की तन्हाई है...
और इस तन्हाइयों में...
मुझे तेरा इंतजार...

आशीष गुप्ता...

Saturday, 28 August 2021

मेरी ज़िन्दगी...



ये मेरी ज़िन्दगी मैं तुझे क्या लिखूं...
मोहब्बत लिखूं की इबादत लिखूं...
शब्द नहीं है बयां करने को...
तुम्हारी ये जो प्यारी सी हसीं है...
वहीं मेरी ख़ुशी है...
तुम्हारा ज़िक्र ही मेरा फ़िक्र है....
तुम बिन मैं अधूरा हूं...
तुम हो तो मैं पूरा हूं...


आशीष गुप्ता...

आज लिखने का मन नहीं था... लेकिन किसी की याद ने फिर से दस्तक दे दी... सोचा था आज ख़ामोश ही रहूंगा... मगर उनकी यादों ने फिर से एक ग़ज़ल ही लिखवा...