Monday, 20 July 2026

कभी ऑफिस की फ़ाइलें... कभी ज़िम्मेदारियों का बोझ....

इस भागती हुई ज़िंदगी में...हर दिन बस नई खोज....

सुबह से शाम कब ढल जाती है...पता ही नहीं चलता...

दिल तो हर पल तुम्हें याद करता है...

बस वक़्त का पता ही नहीं चलता...

अगर मेरी ख़ामोशी से तुम नाराज़ हो गए हो...

तो यक़ीन मानो...

हम भी अंदर ही अंदर बिखर गए हैं...

चलो आज सारी शिकायतें हवा में उड़ा देते हैं...

जो दूरियाँ आ गई हैं...उन्हें मुस्कुराकर मिटा देते हैं...

ज़िंदगी की इस भागदौड़ में...बस इतना-सा साथ चाहिए...

तुम फिर से "कैसे हो?" कह दो...मुझे और क्या चाहिए...

आशीष

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कभी ऑफिस की फ़ाइलें... कभी ज़िम्मेदारियों का बोझ.... इस भागती हुई ज़िंदगी में...हर दिन बस नई खोज.... सुबह से शाम कब ढल जाती है...पता ही नहीं...